डायबिटीज और किडनी – कौन से टेस्ट ज़रूरी हैं?

डायबिटीज केवल ब्लड शुगर की बीमारी नहीं है – यह आपकी किडनी पर भी गहरा असर डाल सकती है। अगर समय रहते टेस्ट नहीं कराए जाएं, तो किडनी फेलियर जैसी गंभीर समस्या भी हो सकती है।
डायबिटिक नेफ्रोपैथी (Diabetic Nephropathy) एक ऐसी स्थिति है जिसमें हाई ब्लड शुगर किडनी की फ़िल्टरिंग यूनिट्स को नुकसान पहुंचाता है। शुरुआत में लक्षण कम होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है।
ज़रूरी किडनी टेस्ट:
- यूरीन एल्बुमिन टेस्ट: पेशाब में प्रोटीन की मात्रा जांचने के लिए।
- क्रिएटिनिन टेस्ट: ब्लड में किडनी वेस्ट लेवल को मापता है।
- eGFR (Estimated Glomerular Filtration Rate): किडनी की फ़िल्टरिंग क्षमता का आकलन।
- 24 घंटे यूरिन कलेक्शन: सटीक प्रोटीन लीक पता करने के लिए।
- ब्लड यूरिया नाइट्रोजन (BUN): किडनी के मेटाबोलिक फंक्शन का संकेत।
कब और कितनी बार टेस्ट कराना चाहिए?
- हर 6 से 12 महीने में एक बार नियमित जांच कराएं।
- अगर डायबिटीज 5 साल से अधिक पुरानी है, तो साल में दो बार टेस्ट कराएं।
- उच्च रक्तचाप या किडनी का फैमिली हिस्ट्री है, तो ज्यादा सतर्क रहें।
डॉ. सुनंदा साहू (BNYS) बताती हैं: “डायबिटिक मरीजों के लिए किडनी की निगरानी बेहद जरूरी है। समय पर जांच और जीवनशैली में बदलाव से किडनी डैमेज को रोका जा सकता है। नेचुरल थेरेपी के जरिए कई मामलों में सुधार देखा गया है।”
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।